"मुसलमानों का खुला दुश्मन"
आज हम सोचने पर मजबूर हैं की भारतीय समाज में मुस्लिम शब्द से नफरत का सबसे बङा कारण क्या है ? आज इस्लाम और मुसलमान को सीधे तौर पर आतंकवाद की श्रेणी में रखने वाले कौन हैं ? किनकी वजह से आज मुसलमानों को सीधे तौर पर ताने दिये जाते हैं ? इसको समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों से लेकर आजतक की इन बातों पर ध्यान दिजिये।
आज हर दिन बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई की खबर आम होती जा रही है, कोई 10 साल कोई 15 तो कोई 23 साल बाद बेकसूर रिहा किया जा रहा है, राह चलते मुसलमानों को पकङकर उनपर फर्जी केस दर्ज कर वर्षो जेल के चारदीवारी में घुटते हुए छोङ देना इस जमहुरिय्ती निजाम में आम हो गई है, कल ही की बात, जब 2005 की दीपावली से दो दिन पहले दिल्ली की तीन जगहों पर सीरियल ब्लास्ट हुए थे, जिसमें 60 बेगुनाह नागरिक मारे गए थे और फिर पांच कश्मीरी नौजवानों को ब्लास्ट के इल्ज़ाम में अरेस्ट किया गया था, जिसमे से 2010 में दो मुल्ज़िम बरी कर दिए गए थे, बाकी तीन मुलजिमों को कल बेकसूर रिहा कर दिया गया।
ठीक इसी तरह मोहम्मद हनीफ को 14 साल बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा अहमदाबाद के सीरियल टिफिन ब्लास्ट केस में बेकसूर पाए जाने पर रिहाई मिली. 29 मई 2002 को अहमदाबाद में पांच बसों में टिफिन ब्लास्ट हुए थे जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए थे. अप्रैल 2003 में हनीफ को क्राइम ब्रांच ने इसमें शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
ये केवल वर्तमान के दो दिन की कहानी है, ऐसे ही कुछ निम्नलिखित नाम हैं जिनके वर्षों जेल में कटे वो भी बेकसूर होने पर। जिनके दर्द सुनने की आजतक कोशिश नहीं की गई।
● 1) दिसंबर, 1996 और अक्तूबर, 1997 में दिल्ली, रोहतक, सोनीपत और गाजियाबाद में करीब 20 देसी बम विस्फोटों के आरोप में गिरफ्तार तब दिल्ली के मोहम्मद आमिर खान को 14 साल बाद अदालत ने रिहा किया। लेकिन इन वर्षों में उनकी दुनिया उजड़ गई. गिरफ्तारी के तीन साल बाद वालिद हाशिम खान समाज के बहिष्कार और न्याय की आस छोड़कर दुनिया से चल बसे, तो दशक भर की लड़ाई के बाद 2008-09 में आखिर आमिर की मां की हिम्मत भी जवाब दे गई। वे लकवाग्रस्त हो गईं. पिछले वर्ष जनवरी में जेल से रिहा आमिर कहते हैं, ''आज भी अपनी वालिदा के मुंह से 'बेटा’ शब्द सुनने को तरसता हूं।"
● 2) नई दिल्ली - जयपुर की विशेष टाडा अदालत द्वारा न्यायाधीश वी माथुर ने 28 फरवरी 2004 को अपने फैसले में डॉ जी अंसारी को 15 साल कैद की सजा सुनाई थी , जमीअत उलेमा हिंद ने टाडा अदालत के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुयें सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी , जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने डाक्टर अंसारी को निर्दोष मानते हुयें टाडा अदालत के फैसले को खारिज़ करके रिहाई का आदेश दे दिया है। डाक्टर अंसारी 21 वर्ष बाद जेल से निर्दोष साबित होते हुए रिहा हुए।
● 3) लखनऊ में नौ साल पहले दिल्ली क्राईम ब्रांच ने 21 मई 2008 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के क़रीब से हूजी के जिस तथाकथित आतंकी इक़बाल को गिरफ़्तार किया था उसे लखनऊ की विशेष अदालत ने बाइज़्ज़त बरी कर दिया, इतना ही नहीं इक़बाल के ऊपर लखनऊ के अलावा दिल्ली में भी आतंकवाद का आरोप लगाए गये थे जिसमें वह पहले ही बरी हो चुके थे ।
● 4) मुफ्ती अब्दुल कयूम को मुहम्मद सलीम तथा चार अन्य लोगों के साथ सन् 2002 में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर में आतंकवादी घटना के आरोप में गिरफ्तार किया गया था जिसमें 32 श्रृद्धालू मारे गये थे तथा सुरक्षा बलों ने 2 आतंकवादियों को मौके पर ही मार गिराया था , 13 वर्षों बाद उच्चतम न्यायालय ने सभी आरोपियों को बाईज्जत बरी कर दिया गया , मुफ्ती अब्दुल कयूम की लिखी किताब पढ़ें तो रोंगटे खड़े हो जाएँगे कि केवल मुसलमान होने के कारण गुजरात की पुलिस ने उनपर और 5 अन्य आरोपियों पर क्या क्या ज़ुल्म किये और फिर तीन विकल्प दिये कि अपनी पसंद में से एक चुन लो जिसमें तुम सबको आरोपी बनाया जा सके , गोधरा , अक्षरधाम और हिरेन पांड्या हत्याकांड । सोचिए कि पुलिस कैसे और क्या क्या आरोप लगाती है जिसे अन्य लोग कैसे केवल आरोप लगाते ही उस आरोपी के पूरे समुदाय को गालियाँ देना प्रारंभ कर देते हैं ।
● 5) आतंकियों से जुड़े होने के आरोप में इरशाद को 11 साल जेल में रहना पड़ा था, आरोप झूठे साबित हुए। पिछले वर्ष 22 दिसंबर को दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। जेल में रहते हुए उन्होंने अपने माता-पिता और एक 6 महीने की बेटी को खो दिया। उन्होंने कहा कि मेरी मां मेरी गिरफ्तारी के एक साल बाद ही मर गई। वह पुलिस स्टेशन आती रही सिर्फ अपमानित होने के लिए। मेरे पिता की मौत इसी साल हो गई थी। उन्होंने मुझे जेल से बाहर निकालने के लिए अपनी एक-एक पाई खर्च कर दी। मेरी बेटी आयफा सिर्फ 6 महीने की थी जब मुझे जेल हुई थी।
● 6) 23 साल जेल में रहने वाले निसार को शायद ही कोई भुल पाए , निसार जेल जाते समय 20 वर्ष के थे और रिहाई के समय 43 वर्षीय हो गए, वो कहते हैं कि पकङे जाने के वक्त मेरी बहन 8 वर्षीय थी और आज उसकी बेटी 10 साल की है, उनकी कहानी सुनाते हुए रवीश कुमार के भी आंख भर आए थे।
● 7) आठ साल और 9 महीने के बाद नौशाद और उनके साथ तीन शख्स को जनवरी 2016 में आतंकवाद के आरोपों से अदालत द्वारा बाइज्जत बरी किए गए था, जिसके बाद उन्होंने दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ सुनाई थी, उनके जख्म भरे नहीं थे की युपी के तथाकथित सेकुलर पार्टी ने उन्हें 13 जनवरी 2017 को उनके घर से दोबारा उठवा लिया।
● 8) 2006 मालेगाँव विस्फोट का बेगुनाह मुस्लिम नुरुल हुदा कहते हैं कि ATS अफसर ने कहा था कि , तू दाढ़ी क्यों रखता है , तू टोपी क्यों पहनता है , नमाज़ क्यों पढता है ,तू फ़िल्में क्यों नहीं देखता ,तू कट्टर मुसलमान है , हम तुम जैसे मुसलमानों से जेलों को भर देंगे (उनकी खुदकी विडियो द्वारा) उन्होंने बताया था कि कैसे कैद का समय पूरे परिवार पर भारी पड़ता है।
● 9) आप अब्दुल करीम टुंडा को नहीं भुल सकते हैं, एक 73 वर्षीय बुजुर्ग जब रिहा होता है तो मिडिया में सन्नाटा पसर जाता है, जबकि इसी मिडिया ने उस बुजुर्ग को टुंडा का लकब केवल इसलिए दे दिया की उनका एक हाथ सही नहीं है, यहाँ तक कि उनके रिहा होने से एक दिन पहले उनपर जेल में जानलेवा हमला होता है, ठीक उसी तरह जैसे सरबजीत पर पाकिस्तान में हुआ था।
● 10) अनस माचीस वाला, कलीम हबीब करीमी, हनीफ अ.रज्जाक पाकीटवाला, हबीब हवा के आलावा मोहम्मद मदनी जैसे दर्जनों लोग हैं जिन्हें फर्जी आतंकवाद के केस में झूठा फंसाया गया और बाद में यह लोग रिहा हुए, और अपने जीवन के बहुमूल्य दिनों को जेल की कोठरी के नाम कर दिए जबकि वे बेकसूर थे।
ये तो रही कैद में जुल्म की दास्तान, बाजऔकात ऐसा भी हुआ है जिसकी वजह से आज भी मुसलमानों को ताने दिये जाते हैं , इसका सीधा उदाहरण देखिए, 29 सितम्बर 2008 को हुए मालेगाँव बम विस्फोट में शामिल मोटरसाइकल साध्वी प्रज्ञा के नाम की थी, आरटीओ आफिस से प्रमाणित होने के बाद उसी आधार पर साध्वी प्रज्ञा को 23 अक्टूबर 2008 को गिरफ्तार कर लिया गया था। बजाहिर है कि यह एक आतंकवादी घटना थी, और गिरफ्तारी के चार दिन बाद 27 अक्टूबर 2008 को एक आतंकवादी से मिलने वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह और तत्कालीन तथा वर्तमान मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शिवराज सिंह चौहान भी जाते हैं। यह देश में एक ऐसा उदाहरण है कि एक आतंकवादी घटना के आरोपी से मिलने देश के राजनेता गए और देश तथा मिडिया में इसपर चर्चा तक न हुई। अब तो साध्वी के रिहा होने तक के कयास लगाए जा रहे हैं।
ठीक इसी प्रकार याकूब मेनन के पास भी ऐसे ही कार थी जो उसके नाम पर थी, जिसके कारण वह मुम्बई बम धमाकों का आरोपी था, उसने आत्मसमर्पण किया , 23 वर्ष जेल में रहा और फाँसी पर लटका दिया गया ,,कोई मुस्लिम उससे मिलने नहीं गया। उसकी फाँसी का विरोध भी सबने किया तो इस तर्क और तथ्य के साथ कि 23 वर्ष की जेल के बाद एक सहअभियुक्त को फाँसी देना उचित नहीं , कोई उसको निर्दोष या रिहा करने की माँग नहीं किया, परंतु पुरे देश ने मुसलमानों को गद्दार ठहरा दिया। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसके कारण आज तक भारत के मुसलमानों को ताना दिया जाता है।
इन सब का दोशी मोदी , संघ, भाजपा को मत दिजिये क्योंकि उनका खुला एजेंडा हिंदुत्व रहा है, ये जो जेलों में 80,000 से अधिक अंडर ट्राइल मुस्लिम कैदी हैं वो भाजपा की करतूत है ? आपके बदनामी के पीछे भाजपा का हाथ नहीं बल्कि आज जो मुसलमानों की हालत है उसके जिम्मेदार केवल सत्तासीन सेकुलर पार्टि रही हैं, उपरोक्त जैसी घटनाएं भाजपा के शासनकाल में ना के बराबर हुई हैं, मुसलमान भाजपा को अपना खुला दुश्मन मानता आया है जबकि हम ये भूल गए कि छुपे दुश्मन से खुला दुश्मन ज़्यादा बेहतर होता है, इसकी एक मिसाल यह है कि भाजपा के शासनकाल में ज्यादा बेकसूर मुसलमान रिहा हुए हैं, पिछले वर्ष की बात याद किजिए जब दिल्ली में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिम युवकों की गिरिफ्तारी हुई थी। तब गृह मंत्री राजनाथ सिंह की पहल पर उन युवकों को रिहा किया जा चुका था, ज़रा अपने दिल पर हाथ रख कर बताईयेगा क्या इससे पहले सत्ताधारी सेकुलर पार्टी के राज में कभी मुस्लिम युवकों को आतंकवाद के नाम पर उठाये जाने पर इतनी जल्दी रिहाई नसीब हुयी थी ? बिल्कुल भी नहीं,
अब समझ आया आपका छुपा दुश्मन सियासत के खेल में आपको जेलों में ठूसकर खुले दुश्मन से भी ख़तरनाक खेल खेलता रहा है और आपने अपने अंगुठे की जोर और अपने ऊंगली पर स्याही लगाकर हमेशा उनकी खुशआमद की और वो आपके पीठ पर वार करते चले गए।

No comments:
Post a Comment